श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.11.27

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

सितातपत्रव्यजनैरुपस्कृतः प्रसूनवर्षैरभिवर्षितः पथि।

पिशङ्गवासा वनमालया बभौ घनो यथार्कोडुपचापवैद्युतैः॥ २७

sitātapatravyajanairupaskṛtaḥ prasūnavarṣairabhivarṣitaḥ pathi|

piśaṅgavāsā vanamālayā babhau ghano yathārkoḍupacāpavaidyutaiḥ|| 27

अर्थ

द्वारकाके राजपथपर भगवान् श्रीकृष्णके ऊपर श्वेतवर्णका छत्र तना हुआ था, श्वेत चँवर डुलाये जा रहे थे, चारों ओरसे पुष्पोंकी वर्षा हो रही थी, वे पीताम्बर और वनमाला धारण किये हुए थे। इस समय वे ऐसे शोभायमान हुए, मानो श्याम मेघ एक ही साथ सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्रधनुष और बिजलीसे शोभायमान हो॥ २७॥✎ 82

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #82 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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