॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.10.35
मरुधन्वमतिक्रम्य सौवीराभीरयोः परान्।
आनर्तान् भार्गवोपागाच्छ्रान्तवाहो मनाग्विभुः॥ ३५
marudhanvamatikramya sauvīrābhīrayoḥ parān|
ānartān bhārgavopāgācchrāntavāho manāgvibhuḥ|| 35
अर्थ
शौनकजी! वे कुरुजांगल, पांचाल, शूरसेन, यमुनाके तटवर्ती प्रदेश ब्रह्मावर्त, कुरुक्षेत्र, मत्स्य, सारस्वत और मरुधन्व देशको पार करके सौवीर और आभीर देशके पश्चिम आनर्त देशमें आये। उस समय अधिक चलनेके कारण भगवान्के रथके घोड़े कुछ थक-से गये थे॥ ३४-३५॥