श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.10.32

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अजातशत्रुः पृतनां गोपीथाय मधुद्विषः।

परेभ्यः शङ्कितः स्नेहात्प्रायुङ्क्त चतुरङ्गिणीम्॥ ३२

ajātaśatruḥ pṛtanāṃ gopīthāya madhudviṣaḥ|

parebhyaḥ śaṅkitaḥ snehātprāyuṅkta caturaṅgiṇīm|| 32

अर्थ

अजातशत्रु युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णकी रक्षाके लिये हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना उनके साथ कर दी; उन्हें स्नेहवश यह शंका हो आयी थी कि कहीं रास्तेमें शत्रु इनपर आक्रमण न कर दें॥ ३२॥

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