॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.10.22
स एव भूयो निजवीर्यचोदितां स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम्।
अनामरूपात्मनि रूपनामनी विधित्समानोऽनुससार शास्त्रकृत्॥ २२
sa eva bhūyo nijavīryacoditāṃ svajīvamāyāṃ prakṛtiṃ sisṛkṣatīm|
anāmarūpātmani rūpanāmanī vidhitsamāno'nusasāra śāstrakṛt|| 22
अर्थ
उन्होंने ही फिर अपने नाम-रूपरहित स्वरूपमें नामरूपके निर्माणकी इच्छा की तथा अपनी काल-शक्तिसे प्रेरित प्रकृतिका, जो कि उनके अंशभूत जीवोंको मोहित कर लेती है और सृष्टिकी रचनामें प्रवृत्त रहती है, अनुसरण किया और व्यवहारके लिये वेदादि शास्त्रोंकी रचना की॥ २२॥