श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.10.2

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

सूत उवाच

वंशं कुरोर्वंशदवाग्‍निनिर्हृतं संरोहयित्वा भवभावनो हरिः।

निवेशयित्वा निजराज्य ईश्‍वरो युधिष्ठिरं प्रीतमना बभूव ह॥ २

vaṃśaṃ kurorvaṃśadavāgninirhṛtaṃ saṃrohayitvā bhavabhāvano hariḥ|

niveśayitvā nijarājya īśvaro yudhiṣṭhiraṃ prītamanā babhūva ha|| 2

अर्थ

सूतजी कहते हैं—सम्पूर्ण सृष्टिको उज्जीवित करनेवाले भगवान् श्रीहरि परस्परकी कलहाग्‍निसे दग्ध कुरुवंशको पुनः अंकुरितकर और युधिष्ठिरको उनके राज्यसिंहासनपर बैठाकर बहुत प्रसन्‍न हुए॥ २॥

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